गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज

 

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गैंगस्टर अबू सलेम की सजा में छूट (रिमिशन) और तत्काल रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि उनका दावा “समय से पहले और गलत समझ पर आधारित” है। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और कमल खाटा की खंडपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि भारत द्वारा पुर्तगाल को प्रत्यर्पण के दौरान दी गई 25 साल की कैद की सीमा एक निश्चित न्यूनतम अवधि है, जिसे रिमिशन के जरिए कम नहीं किया जा सकता।

अबू सलेम को नवंबर 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था। वह वर्तमान में नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। अबू सलेम ने दलील दी थी कि अच्छे आचरण के आधार पर मिली छूट को जोड़ने पर उसने प्रभावी रूप से 25 साल की सजा पूरी कर ली है और उसे रिहा किया जाना चाहिए। इस तर्क को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि- सरल गणना से स्पष्ट है कि सलेम की 25 साल की सजा नवंबर 2030 में ही पूरी होगी। खंडपीठ ने कहा- 2025 में रिहाई का दावा रिमिशन की गलत गणना पर आधारित है। 25 साल की जेल अवधि वह मूल सजा है जिसे याचिकाकर्ता को पूरा करना होगा। यह कोई ऐसी अधिकतम सीमा नहीं है जिसे सामान्य जेल छूट के जरिए घटाया जा सके।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत द्वारा पुर्तगाल को दिया गया यह आश्वासन—कि सलेम को न तो फांसी दी जाएगी और न ही 25 साल से अधिक कैद में रखा जाएगा—बाध्यकारी है और इसे रिमिशन नियमों के जरिए कम नहीं किया जा सकता। अबू सलेम ने दिसंबर 2024 में एक विशेष अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद हाई कोर्ट का रुख किया था। उनकी वकील फरहाना शाह ने तर्क दिया कि उन्होंने प्रत्यर्पण शर्तों के तहत आवश्यक अवधि पूरी कर ली है। केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सलेम ने अब तक केवल लगभग 19 साल की वास्तविक सजा पूरी की है और 25 साल की अवधि का मतलब केवल वास्तविक कैद से है, जिसमें रिमिशन शामिल नहीं है।

अबू सलेम को 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराया गया था और वह कई मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन के अनुरूप उसकी सजा को कुल 25 साल तक सीमित कर दिया था। याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अबू सलेम यह साबित करने में असफल रहा कि उसकी हिरासत अवैध है और नवंबर 2030 से पहले रिमिशन पर विचार करना असंगत है।

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